अब तक कितनी बार टूट चुकी है, बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना

'मराठी अस्मिता' की भावना से बनी बालासाहेब की शिवसेना इस समय अपने सबसे नाजुक दौर से गुजर रही है। बतौर उद्धव ठाकरे के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए पार्टी चार बार टूट का सामना कर चुकी है। पिछले चार सालों में ही इसमें दो राजनीतिक टूट हो चुकीं हैं। सबसे ताजा मामला हम सब जानते हैं कि शिवसेना(यूबीटी) के कुल 9 में से 6 सांसदों ने एकनाथ शिंदे को अपना समर्थन देने का ऐलान किया है। आज के इस आर्टिकल में हम जानेंगे की शिवसेना की शुरूआत कैसे हुई और पार्टी अब तक कितनी बार टूट का सामना कर चुकी है।

कैसे हुई शिवसेना की शुरूआत

बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना 19 जून 1966 को 'मराठी मानुष' (मराठी लोगों) के हकों और उनकी क्षेत्रीय अस्मिता की रक्षा के उद्देश्य के लिए बनाई थी। इसकी शुरुआत एक राजनीतिक दल के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक संगठन के तौर पर हुई थी। बालासाहेब ठाकरे पहले एक फ्रीलांस कार्टूनिस्ट थे। उन्होंने अपने भाई श्रीकांत ठाकरे के साथ मिलकर 1960 में 'मार्मिक' नाम की एक कार्टून साप्ताहिक पत्रिका शुरू की थी। इस पत्रिका के जरिए वे मुंबई में गैर-मराठी लोगों के बढ़ते प्रभाव और स्थानीय लोगों की दुर्दशा पर तीखे व्यंग्य और कार्टून बनाते थे। जब 'मार्मिक' के जरिए उन्हें जनता का भारी समर्थन मिलने लगा, तो उन्होंने इसे जमीनी आंदोलन में बदलने के लिए शिवसेना (शिवाजी की सेना) का गठन किया था। करीब साठ के दशक में मुंबई देश की आर्थिक राजधानी के तौर पर उभर रही थी। उस समय मुंबई की मिलों, सरकारी दफ्तरों, बैंकों और निजी कंपनियों में दक्षिण भारत (विशेषकर मद्रास/चेन्नई और केरल) और अन्य राज्यों से आए प्रवासियों का दबदबा बढ़ने लगा था। इसके कारण स्थानीय मराठी युवाओं को नौकरियां नहीं मिल पा रही थीं और उनमें भारी बेरोजगारी व असंतोष था। बालासाहेब ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और नारा दिया कि 'मुंबई में नौकरियों पर पहला हक मराठी लोगों का है।'

1960 में 'संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन' के बाद भाषा के आधार पर महाराष्ट्र राज्य तो बन गया और मुंबई उसकी राजधानी भी बनी, लेकिन मुंबई के भीतर आर्थिक और प्रशासनिक नियंत्रण अभी भी गैर-मराठी उद्योगपतियों और प्रवासियों के हाथ में था। बालासाहेब का मानना था कि राज्य मिलने के बाद भी मराठी मानुष अपने ही घर में हाशिए पर है। उस दौर में मुंबई के कपड़ा मिल मजदूरों और श्रमिक संगठनों पर कम्युनिस्ट पार्टियों (जैसे CPI) का बहुत मजबूत नियंत्रण था। बाल ठाकरे ने कम्युनिस्टों की इस 'अंतरराष्ट्रीय और वर्ग-संघर्ष' वाली विचारधारा को मराठी अस्मिता के खिलाफ माना। उन्होंने मराठी मजदूरों को एक छत के नीचे लाने और कम्युनिस्टों के प्रभाव को खत्म करने के लिए शिवसेना को एक आक्रामक विकल्प के रूप में पेश किया था। संक्षेप में कहें तो बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना मुख्य रूप से "भूमिपुत्र" सिद्धांत पर की थी, ताकि मुंबई और महाराष्ट्र में स्थानीय मराठी लोगों को उनका हक, रोजगार और सम्मान दिलाया जा सके। बाद में जाकर कहीं अस्सी के दशक के अंत में, शिवसेना ने अपने एजेंडे में 'कट्टर हिंदुत्व' को भी शामिल कर लिया था।

कब-कब हुई शिवसेना में राजनीतिक बगावत

शिवसेना गठन के कुछ साल बाद ही हुई बगावत

बालासाहेब ठाकरे ने साठ के दशक में शिवसेना की बनियाद रखी. 19 जून 1966 को बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना के राजनीतिक दल के रूप में गठन किया. शिवसेना के बने कुछ ही दिन हुए थे कि शिवसेना के दिवंगत संस्थापक बाल ठाकरे और मुंबई के एक नेता बंदू शिंगरे के बीच तनाव हो गया। बंदू शिंगरे शिवसेना के शुरुआती दौर के एक कद्दावर और फायरब्रांड नेता थे, जिन्हें शिवसेना के इतिहास में पहले बागी नेता के रूप में जाना जाता है। मुंबई के परेल-लालबाग जैसे कपड़ा मिल मजदूर इलाकों में उनकी बहुत मजबूत पकड़ थी और शुरुआती शिवसैनिकों में उनका काफी बड़ा कद था। साल 1974 में मुंबई में लोकसभा उपचुनाव होना था। इस चुनाव में बालासाहेब ठाकरे ने कांग्रेस के उम्मीदवार रामराव आदिक को समर्थन देने का फैसला किया था। बंदू शिंगरे बालासाहेब ठाकरे के कांग्रेस को समर्थन देने के इस फैसले के सख्त खिलाफ थे। इसी चलते ही उन्होंने पार्टी छोड़ दी। शिवसेना से बाहर निकलने के बाद बंधु शिंगरे ने शिवसेना के समानांतर एक नया संगठन खड़ा किया। उन्होंने अपनी इस नई पार्टी का नाम 'प्रति शिवसेना' रखा। हालांकि, उनकी पार्टी राज्य की राजनीति में काई खास असर नहीं छोड़ सकी।

छगन भुजबल ने की शिवसेना में दूसरी बगावत

शिवसेना के गठन के बाद से यह पार्टी अपने आक्रामक हिंदुत्व और क्षेत्रीय अस्मिता के लिए जानी जाती रही है, लेकिन इसके साथ ही पार्टी के भीतर आंतरिक कलह और बड़े नेताओं का बाहर निकलना एक ऐतिहासिक सच्चाई रही है। 1991 में छगन भुजबल का बगावत करना शिवसेना के लिए पहला बड़ा झटका था, जिसने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को चुनौती दी। उस समय शिवसेना के 52 विधायक जीतकर आए थे। छगन भुजबल चाहते थे कि उन्हें विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया जाए, लेकिन बालासाहेब ठाकरे ने मनोहर जोशी को नेता प्रतिपक्ष बना दिया। भुजबल इससे नाराज हो गए और दिसंबर 1991 में नागपुर के शीतकालीन सत्र के दौरान उन्होंने शिवसेना के 18 विधायकों के साथ बगावत कर दी। भुजबल ने इन विधायकों के साथ कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर ली थी, जिससे शिवसेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा था।

नारायण राणे की शिवसेना से बगावत

शिवसेना में दूसरी बड़ी बगावत 2005 में हुई, जब पार्टी के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने बगावती तेवर अपनाए। कारण था पार्टी में बालासाहेब ठाकरे के पुत्र उद्धव ठाकरे का पार्टी में कद बड़ना। राणे का आरोप था कि उद्धव ठाकरे के बढ़ते प्रभाव के कारण पार्टी में वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी की जा रही है। बालासाहेब ठाकरे ने उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण शिवसेना से निष्कासित कर दिया था। इसके बाद राणे अपने समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए थे। राणे का जाना शिवसेना के लिए कोंकण क्षेत्र में एक बड़ा झटका था, जहां उनका भारी राजनीतिक प्रभाव था।

राज ठाकरे ने बनाई अपनी अलग पार्टी

शिवसेना के बगावती इतिहास के अध्याय में पार्टी का यह पहला पारिवारिक झटका था।नारायण राणे के जाने के कुछ ही समय बाद, जब बालासाहेब ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने पार्टी छोड़ दी थी। राज ठाकरे को बालासाहेब का स्वाभाविक राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता था, क्योंकि उनकी आक्रामक शैली और भाषण देने का तरीका काफी हद तक बालासाहेब से मिलता था और राज ठाकरे बालासाहेब को ही अपना राजनीतिक गुरू मानते थे। हालांकि, जब उद्धव ठाकरे को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया, तो राज ठाकरे खुद को दरकिनार महसूस करने लगे। यहीं एक बड़ा कारण था कि दिसंबर 2005 में उन्होंने शिवसेना से इस्तीफा दे दिया और 2006 में 'महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना' (MNS) नाम से एक नई पार्टी का गठन किया, जिसने मराठी मानूस के मुद्दे पर शिवसेना के वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई।

एकनाथ शिंदे की बगावत से बदले राज्य सरकार के समीकरण

एकनाथ शिंदे ने पार्टी के स्थापना दिवस के ही महीने में बड़ी राजनीतिक सेंध मारी की थी। शिंदे ने जून 2022 में शिवसेना के इतिहास की सबसे बड़ी और निर्णायक बगावत की। शिंदे ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व और कांग्रेस-एनसीपी के साथ महाविकास अघाड़ी (MVA) गठबंधन के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया था। उनके साथ शिवसेना के 40 से अधिक विधायक और अधिकांश सांसद चले गए थे। इस बगावत के कारण उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा तक देना पड़ा गया था। बाद में चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे के गुट को ही असली 'शिवसेना' माना और उन्हें ही पार्टी का असली नाम 'शिवसेना' और पार्टी का असली चुनाव चिन्ह 'तीर-कमान' सौंप दिया था, जिससे उद्धव ठाकरे के पास केवल शिवसेना (यूबीटी) रह गई थी। और अब इसी शिवसेना (यूबीटी) के

9 में से 6 लोकसभा सांसदों ने अलग राह चुन ली है। इन सांसदों ने उद्धव का साथ छोड़कर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना से हाथ मिला लिया है। इस तरह उद्धव ठाकरे के कार्यकाल में यह चौथी और शिवसेना के पूरे इतिहास की छठी बड़ी टूट है, जिसने महाराष्ट्र की सियासत में उद्धव ठाकरे के सामने एक बार फिर अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है।

बालासाहेब द्वारा बनाए गए कुछ कार्टून

बालासाहेब ठाकरे के कार्टून्स की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वे बिना किसी झिझक के बेहद आक्रामक, सीधे और कभी-कभी क्रूर व्यंग्य करते थे। उनके स्केच में कुछ खास किरदार, प्रतीक और चेहरों की बनावट बार-बार देखने को मिलती थी, जो उनकी पहचान बन गए थे। यहां बालासाहेब ठाकरे द्वारा निर्मित कुछ कार्टून संलग्न किए गए हैं। यह कार्टून थाणे पोस्ट के यूट्यूब चैनल से लिए गए हैं। जिसका एकमात्र उद्देश्य बालासाहेब ठाकरे के सराहनीय कार्य से प्रेरणा लेना है। कार्टून के लिए थाणे पोस्ट को यूट्यूब चैनल का बहुत आभार।

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