क्षेत्रिय पार्टियों में टूट से एनडीए को कितना फायदा , जानिए 'दो-तिहाई' आंकड़े का सियासी गणित

संसद में संविधान संशोधन बिल पास कराने के लिए सरकार को दो तिहाई सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है। अटकलें तेज हो गई हैं कि पार्टियों के टूटने और एनडीए के बढ़ते कुनबे के बाद क्या जादुई आंकड़ा हासिल हो सकेगा। लोकसभा में दो तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए सत्तारूढ़ गठबंधन NDA को 362 मतों की जरूरत है। दरअसल, तृणमूल कांग्रेस के बाद अब शिवसेना यूबीटी में हो रही टूट के चलते इस आंकड़े की चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। खबरें ये भी हैं कि ऐसी ही टूट समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी में भी हो सकती है। हालांकि, सपा ने इससे साफ इनकार कर दिया है। क्या इन दलों के सांसदों के समर्थन के बाद एनडीए दो तिहाई बहुमत हासिल कर सकेगा।

राजनीतिक टूट का टीएमसी चैप्टर

ममता बनर्जी के गढ़ पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली के सत्ता गलियारों तक, तृणमूल कांग्रेस (TMC) में मची अंदरूनी कलह ने इस वक्त देश की सियासत को सबसे ज्यादा गरमाया हुआ है। एक दौर में विपक्षी एकजुटता का मुख्य चेहरा रहीं ममता बनर्जी के लिए यह समय किसी बड़े सियासी झटके से कम नहीं है। दरअसल, टीएमसी में हुई हालिया बगावत ने न सिर्फ बंगाल की राजनीति को प्रभावित किया है, बल्कि दिल्ली के संख्या बल को भी पूरी तरह बदल कर रख दिया है। लोकसभा में टीएमसी के 20 सांसदों के बागी रुख अख्तियार करने और एनसीपीआई (NCPI) में विलय की तरफ बढ़ने से संसद के निचले सदन में विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन के भी नबंर गेम को भी प्रभावित किया है। हालांकि आसनसोल से सांसद शत्रुघ्न सिन्हा के नाम को लेकर बागी गुट में शामिल होने की सारी अटकलें तब समाप्त हो गईं जब उन्होंने खुद सामने आकर इन सभी अफवाहों को पूरी तरह खारिज कर दिया था ओर ममता बनर्जी के साथ बने रहने की बात कही थी। पार्टी के सांसदों के अलाबा करीब 80 में से 60 विधायकों और 4 राज्यसभा सांसदों की भी टूट से एनडीए के बड़ते कुनबे संबंधी इस विषय को प्रासांगिक बना दिया है। तो साफ है कि टीएमसी की यह संगठनात्मक दरार केंद्र की एनडीए सरकार के लिए एक बड़ा 'पॉलिटिकल बोनस' साबित हो सकती है। क्षेत्रीय पार्टियों का यह बिखराव सीधे तौर पर भाजपा के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन को संसद के दोनों सदनों में संविधान संशोधन बिल पास कराने में काफी मदद करेगा।

राजनीतिक टूट का शिवसेना(यूबीटी) चैप्टर

क्षेत्रीय दलों के बिखराव की यही सिर्फ देश के पूर्वी हिस्से तक ही सीमित नहीं है बल्कि देश के पश्चिमी हिस्से में भी सक्रिय है। उद्धव ठाकरे के पार्टी के अध्यक्ष रहते हुए शिवसेना में यह चौथी टूट है। शिवसेना(यूबीटी) के 6 सांसदों ने एकनाथ शिंदे को अपना समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। द्धव ठाकरे द्वारा पार्टी व्हिप जारी कर बुलाई गई बैठक में कुल 9 पार्टी सांसदों में से 3 पहुंचे। यह टूट संसद के दोनों सदनों में विपक्ष के मनोबल को तोड़ने वाली है। इस बगावत के बाद संसद के निचले सदन में इन 6 सांसदों का झुकाव एनडीए की ताकत को 313 से बढ़ाकर सीधे 319 पर पहुँचाने का जरिया बन रहा है।

पहले डालते हैं आंकड़ों पर नजर

लोकसभा में भाजपा के पास कुल 240 सांसद हैं। जबकि, समर्थक दलों को मिलाने के बाद एनडीए का आंकड़ा 293 पर पहुंच जाता है। दरअसल, साल 2024 में हुए चुनावों में भाजपा को उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बड़ा झटका लगा था और 2014 और 2019 में बहुमत में रहे दल को सरकार बनाने के लिए जनता दल यूनाइटेड, तेलुगु देशम पार्टी, जननायक जनता दल समेत कई पार्टियों की मदद लेनी पड़ी थी।

दो तिहाई के जादुई आंकड़े की जरूरत क्यों

लोकसभा में कुल सीटें 543 हैं और दो तिहाई के लिए 362 सीटों की जरूरत है। अब जब निचले सदन में नौगांव, बशीरहाट और शिलॉन्ग के रूप में 3 सीटें खाली हैं, तो यह संख्या घटकर 360 पर आ जाती है। अब संविधान संशोधन विधेयकों पास कराने के लिए सरकार को दो तिहाई सांसदों के समर्थन की जरूरत है। हालांकि, दो दलों के टूटने के बाद यह संख्या काफी दूर नजर आती है।

क्षेत्रिय पार्टियों में टूट से कितना फायदा

फिलहाल, टीएमसी में टूट पर लगभग मुहर लगती दिख रही है, शिवसेना यूबीटी को लेकर गुरुवार को स्थिति काफी साफ हो गई जब बागी सांसदों ने एकनाथ शिंदे को अपना समर्थन देने की बात कही। इन सब घटनाओं के बीच अब समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी को लेकर भी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। सपा के पास 37 और आप के पास 3 सांसद हैं। जबकि, टीएमसी के 20 सदस्य बागी हुए हैं और शिवसेना यूबीटी से 6 सांसद अलग हो सकते हैं।

दो-तिहाई बहुमत से आखिर कितना दूर एनडीए

अप्रैल 2026 में सरकार संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 को पास कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत से 54 वोट पीछे रह गई थी। सदन में मौजूद और मतदान करने वाले 528 सांसदों में से सरकार को केवल 298 वोट मिले थे, जबकि जरूरत 352 वोटों की थी। आपको बता दें कि लोकसभा की कुल 543 सीटों के हिसाब से दो-तिहाई बहुमत के लिए 362 का आंकड़ा चाहिए।

वर्तमान में एनडीए की मौजूदा ताकत 293 सांसदों की है। दो तिहाई बहुमत के आंकड़े 69 सीटें दूर है। TMC के 20 बागी सांसदों के साथ यह संख्या 313 पर पहुंचती है। शिवसेना (UBT) के 6 सांसदों के जुड़ने से यह आंकड़ा 319 तक पहुंचता है। इसके बाद भी दो तिहाई बहुमत के लिए 33 सीटों की जरूरत रह जाएगी। संसद में अगर डीएमके के 22 सांसदों का समर्थन मिल भी जाएगा तो एनडीए को 9 सीटों की और आवश्यकता होगी। अप्रैल में एनडीए को इस बिल पर वोटिंग के दौरान 298 वोट मिले थे। इस आंकड़े में टीएमसी के 20 और शिवसेना के 6 बागियों को जोड़ें, तो यह संख्या 324 पहुंचती है। यह दो-तिहाई बहुमत से 28 वोट दूर होगी। अगर सभी 22 डीएमके सांसद भी समर्थन दे दें तो बहुमत से 6 वोट दूर रह जाएगी। वाईएसआरसीपी (YSRCP) के 4 सांसदों, 7 निर्दलीयों और अन्य छोटे दलों की मदद से इसे पूरा किया जा सकता है। इसका अर्थ इस निष्कर्ष के काफी करीब पहुंचता है कि यदि क्षेत्रिए पार्टियों में इसी तरह टूट जारी रहती है तो एनडीए इस जादुई आंकड़े को छू सकती है।

एनडीए के लिए इतना भी आसान नहीं होगा डीएमके के समर्थन को हासिल करना

डीएमके हमेशा से इस परिसीमन विधेयक का सबसे मुखर विरोधी रही है। तमिलनाडु चुनावों से पहले डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन ने इस विधेयक की कॉपियां तक जला दी थीं और जनता से घरों पर काले झंडे फहराने की अपील की थी। दक्षिण भारतीय राज्यों की मुख्य चिंता यह है कि यदि परिसीमन को मौजूदा जनसंख्या के आधार पर किया गया तो जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है, उनकी लोकसभा सीटें कम हो जाएंगी और उत्तर भारत की सीटें बढ़ जाएंगी। वहीं डीएमके के सांसद ए. राजा ने साफ किया है कि वे इस प्रारूप के खिलाफ हैं और सिर्फ इंडिया गठबंधन से बाहर होने का मतलब यह नहीं कि वे भाजपा के साथ चले जाएंगे।

राज्यसभा में एनडीए का सियासी गणित

लोकसभा के मुकाबले राज्यसभा में एनडीए दो तिहाई बहुमत के बेहद करीब पहुंच चुका है। राज्यसभा में भाजपा के पास अपने दम पर 114 सीटें हैं, जो उसका अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। विपक्षी कांग्रेस के पास केवल 30 सीटें हैं। 18 जून को झारखंड में राज्यसभा चुनाव में एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी की संभावित जीत से एनडीए का आंकड़ा 148 से बढ़कर 152 हो सकता है। पश्चिम बंगाल में टीएमसी सांसदों के इस्तीफे से खाली हुई 3 सीटों पर भाजपा की जीत तय मानी जा रही है, जिससे एनडीए का आंकड़ा 155 पहुंच जाएगा। दो-तिहाई बहुमत से सिर्फ 8 सीटें दूर होगा। दूसरी तरफ, डीएमके के बाहर होने और आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों के टूटने के बाद विपक्षी इंडिया गठबंधन राज्यसभा में घटकर महज 63 सीटों पर सिमट गया है।

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